जीवन
में अद्भुत घटनाएँ घटती हैं, कभी हमारा ध्यान उन
पर जाता है कभी नहीं, हम कभी उनके प्रति सजग होते हैं कभी
नहीं, लेकिन हम उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। हमारे ध्यान और सजगता का उन
घटनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन इतना जरूर होता है कि वैसी घटनाओं की
तीव्रता उनका क्रम कम या ज्यादा हो जाता है। ये घटनाएँ हमारे-अपने जीवन में बदलाव
ला सकती हैं। अपने जीवन को बदलने का यह अत्यंत सरल उपाय है जिसे हम प्रायः नजर
अंदाज कर देते हैं। किसी पुस्तकालय में बैठा था, कई
पत्रिकाएँ पड़ी थीं। उनके पन्ने पलटने लगा। कई लघु कथाओं पर नजर पड़ी, एक-से-एक जीवनोपयोगी। उन्हें पढ़ता और विचार करने लगता। ऐसा लगा कि ये लघु
कथाएँ किसी विशेष प्रयोजन के कारण ही मेरी आँखों के सामने आ रही हैं। मैंने उनमें
से दो को आप लोगों से साझा करने का मन बनाया। प्रस्तुत है वही दो लघु कथाएँ।
***
घर
- खलील जिब्रान
बस, यही एक ऐसा घर है जहां तुम बिना किसी आमंत्रण के अनगिनत बार जा
सकते हो।
इस घर में, प्यार भरी निगाहें
तबतक दरवाज़े पर लगी रहती हैं, जब तक तुम दिख नहीं जाते! यह
घर, तुम्हें उन बेफिक्री के दिनों की याद दिलाता है जहां
तुमने खुशियों-भरा बचपन गुज़ारा था।
वह घर, जहां तुम्हारी उपस्थिति तुम्हारे माता-पिता के
चेहरे की खुशी बन कर छा जाती थी। इस घर में, वह
खुशी तुम्हारे लिए आशीष है और मां-बाप से बातचीत एक पुरस्कार।
यह ऐसा घर है, जहां यदि तुम नहीं
जाओगे तो घर का मालिक उदास हो जायेगा;
इस घर में दो मोमबत्तियां जला कर
संसार में उजाला किया जाता है, जो तुम्हारे जीवन
को सुखमय बना दे।
इस घर में खाने के समय यदि तुम
कुछ नहीं खाते हो तो मकान-मालिक का दिल टूट जायेगा, वह नाराज़ भी हो सकता है।
यह
घर तुम्हें जीवन की सारी खुशियां देता है।
बच्चों, इससे पहले कि बहुत देरी हो जाये इन घरों की कीमत पहचान लो।
भाग्यशाली हैं वे जिनके पास जाने के लिए
मां-बाप का घर है।
***
वृद्धाश्रम
मीरा जैन
आज माँ अस्पताल में भर्ती शायद अन्तिम
साँसें गिन रही थी। अपनी माँ की हालत से व्यथित नवल, अपने फेसबुक तथा वट्सअप के दोस्तों से एक विनम्र अपील की -
"प्यारे दोस्तों! मेरी माँ बहुत बीमार है माँ जल्दी स्वस्थ हो जाए इसलिए आप
सभी की दुआ और प्रार्थना कि मुझे बेहद आवश्यकता है।"
परिणामतः दोस्तों की आत्मीय संवेदनाएँ
लगातार प्राप्त होती रहीं थी और वह उन्हें निरन्तर प्रेषित करने के बजाय उसका दुख
कम करने हेतु स्वयं ही उसके पास अस्पताल पहुँच गया और उसके कानों में माँ के
स्वास्थ्य सुधार का एक अचूक नुस्खा बताया जिसे सुन नवल के चेहरे पर छायी चिन्ता की
लकीरें कम होने के बजाय फैलकर दुगुनी हो गयी थी। आगंतुक ने केवल इतना ही कहा था-
"तुम अन्दर जाकर माँ के कानों में केवल इतना ही कह दो, "माँ तुम जल्दी ठीक हो जाओ, तुम्हारे बिना घर
सूना पड़ा है।"
वह आगन्तुक और कोई नहीं वृद्धाश्रम का
मैनेजर था।
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